मुजफ्फरनगर। पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देने और विद्यार्थियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाने के उद्देश्य से गुजरात के कच्छ में आयोजित अखिल भारतीय पर्यावरण कार्यशाला में जल संरक्षण, वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन और हरित विद्यालय जैसी गतिविधियों पर विस्तार से मंथन किया गया। कार्यशाला में देश के 26 राज्यों से पहुंचे 49 पर्यावरण पदाधिकारियों एवं पर्यावरणविदों ने अपने अनुभव साझा किए और आगामी वर्ष की कार्ययोजनाओं पर विचार-विमर्श किया। कार्यशाला में प्रतिभाग कर लौटे विद्यालय के प्रधानाचार्य गोविंद गुप्ता ने विद्यालय परिवार के साथ इसकी विस्तृत जानकारी साझा करते हुए पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों को विद्यार्थियों के बीच और प्रभावी ढंग से संचालित करने पर जोर दिया।
तीन से पांच अक्टूबर 2026 तक श्री रामकृष्ण ट्रस्ट, कुकमा गांव, भुज, कच्छ (गुजरात) में आयोजित इस राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रयासों का विस्तार करना, विभिन्न राज्यों में चल रही गतिविधियों से सीखना और आगामी वर्ष के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करना था। कार्यशाला में पर्यावरण संरक्षण के व्यावहारिक उपायों के साथ-साथ संगठनात्मक कार्यों, नियमित समीक्षा और समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी पर भी चर्चा हुई। प्रधानाचार्य गोविंद गुप्ता ने बताया कि कार्यशाला में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित पर्यावरणीय गतिविधियों की जानकारी प्रस्तुतियों के माध्यम से दी। इनमें जल प्रबंधन, वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन, वर्षाजल संचयन, बोरी बंधान, हर्बल वाटिका विकसित करने और सौर ऊर्जा के उपयोग जैसे विषय प्रमुख रहे। इन गतिविधियों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को दैनिक जीवन और शैक्षणिक संस्थानों से जोड़ने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की गई। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में डी. रामा राम विश्वोई ने कार्यशाला के उद्देश्यों और वार्षिक कार्ययोजना की जानकारी दी। मुख्य अतिथि मनोज भाई सोलंकी ने पर्यावरण को जीवन का कवच बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और संरक्षण के प्रयासों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने के महत्व को रेखांकित किया। विद्या भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री गोविंद चंद महंत ने पंचतत्व आधारित पर्यावरण चिंतन, हरित विद्यालय की अवधारणा और पर्यावरण शिक्षा को विद्यालय की नियमित गतिविधियों से जोड़ने पर विशेष बल दिया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित रखने के बजाय इसे विद्यार्थियों के व्यवहार और दिनचर्या का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यशाला के समापन सत्र में बालकृष्ण जी ने पर्यावरण संबंधी कार्यों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाने की बात कही। उन्होंने प्रभावी कार्यप्रणाली के लिए तंत्र, बैठक एवं प्रवास को महत्वपूर्ण आधार बताते हुए नियमित समीक्षा, अनुभवों के आदान-प्रदान और जमीनी स्तर पर निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यशाला में इस बात पर भी जोर रहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी योजनाओं का प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब उन्हें व्यवस्थित ढंग से लागू किया जाए और उनके परिणामों की नियमित समीक्षा की जाए। प्रधानाचार्य गोविंद गुप्ता ने कहा कि राष्ट्रीय कार्यशाला में विभिन्न राज्यों के अभिनव प्रयासों और अनुभवों को जानने का अवसर मिला। इन अनुभवों का उपयोग विद्यालय की आगामी पर्यावरणीय गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाने में किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को जल संरक्षण, पौधारोपण, कचरे के उचित प्रबंधन, वर्षाजल संचयन और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करना समय की आवश्यकता है। विद्यालयों में हरित वातावरण विकसित करने के साथ विद्यार्थियों को पर्यावरण के प्रति व्यवहारिक जिम्मेदारियों का भी बोध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक व्यक्ति, संस्था या विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सामूहिक दायित्व है। विद्यालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि विद्यार्थियों में बचपन से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित की जा सकती है। राष्ट्रीय कार्यशाला में प्राप्त अनुभव और सुझाव विद्यालय की आगामी योजनाओं के लिए उपयोगी साबित होंगे तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा प्रदान करेंगे।















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